499 ई. में 23 वर्ष की आयु में आर्यभट ने लिखा कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, पाई का मान चार दशमलव तक निकाला और ग्रहणों की वैज्ञानिक व्याख्या की।
499 ई. में कुसुमपुर (आधुनिक पटना के पास) के एक 23 वर्षीय विद्वान ने 121 श्लोकों की एक छोटी-सी पुस्तक पूरी की जिसने विज्ञान को सदा के लिए बदल दिया। आर्यभट की आर्यभटीय में ऐसे सत्य हैं जिन्हें यूरोप ने हज़ार वर्ष बाद स्वीकारा।
499 ई. में आर्यभट ने क्या-क्या सही बताया
- पृथ्वी का घूर्णन: "जैसे आगे बढ़ती नाव में बैठा मनुष्य किनारे की अचल वस्तुओं को पीछे जाते देखता है, वैसे ही लंका में स्थित लोगों को अचल तारे पश्चिम की ओर जाते दिखते हैं।" (आर्यभटीय, गोल 9)
- पाई का मान चार दशमलव तक: 62832/20000 = 3.1416 — और विलक्षण बात यह कि उन्होंने इसे आसन्न ("निकटवर्ती") कहा, अर्थात वे समझते थे कि पाई का सटीक मान संभव नहीं।
- ग्रहणों की वैज्ञानिक व्याख्या: चंद्रग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी की छाया में प्रवेश करता है — ज्यामिति से ग्रहण की गणना।
- नाक्षत्र वर्ष की अवधि: 365 दिन, 6 घंटे, 12 मिनट, 30 सेकंड — आधुनिक मान से केवल कुछ मिनट का अंतर।
- चंद्रमा और ग्रह सूर्य के परावर्तित प्रकाश से चमकते हैं।
- त्रिकोणमिति: उनकी ज्या सारणियां आधुनिक sine फलन की पूर्वज हैं — "sine" शब्द भी संस्कृत ज्या से अरबी और लैटिन होते हुए बना है।
विश्व भर में और युगों तक मान्यता
आर्यभट की रचनाएं 8वीं शताब्दी तक अरबी में अनूदित होकर इस्लामी खगोल विज्ञान की आधारशिला बनीं, जिसने आगे यूरोप को दिशा दी। 1975 में स्वतंत्र भारत ने अपने प्रथम उपग्रह का नाम "आर्यभट" रखा — अंतरिक्ष युग के भारत की ओर से उस महापुरुष को श्रद्धांजलि जिसने उसकी वैज्ञानिक परंपरा का सूत्रपात किया।
अचलानि भानि तद्वत् समपश्चिमगानि लङ्कायाम्॥
गर्व का कारण
आर्यभट अकेले नहीं थे। वे वेदांग ज्योतिष से चली आ रही अखंड भारतीय परंपरा में खड़े थे, और उनके बाद वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य जैसे दिग्गज आए। एक सहस्राब्दी से अधिक समय तक भारत विश्व की गणित और खगोल विज्ञान की महाशक्ति था।