ऑक्सफोर्ड या बोलोग्ना से सदियों पहले भारत में अंतरराष्ट्रीय आवासीय विश्वविद्यालय चलते थे। नालंदा में 10,000 विद्यार्थी थे और इतना विशाल पुस्तकालय कि कहते हैं महीनों जलता रहा।
जब यूरोप के सबसे पुराने विश्वविद्यालय (बोलोग्ना, 1088 ई.) में पहले विद्यार्थी भर्ती हुए, तब बिहार का नालंदा महाविहार पहले ही छह सौ वर्षों से चल रहा था। और नालंदा स्वयं एक पुरानी परंपरा का उत्तराधिकारी था: तक्षशिला, जो 5वीं शताब्दी ई.पू. तक फल-फूल रही थी — जहां परंपरा के अनुसार पाणिनि ने व्याकरण रचा, चाणक्य ने राजनीति पढ़ाई और चरक की चिकित्सा परंपरा पनपी।
नालंदा सच्चा विश्वविद्यालय क्यों था
- प्रवेश परीक्षा: चीनी यात्री ह्वेनसांग (जिन्होंने 630 के दशक में नालंदा में अध्ययन किया) लिखते हैं कि द्वारपाल विद्वान आवेदकों की परीक्षा लेते थे, और दस में से केवल दो-तीन को प्रवेश मिलता था।
- विशाल पाठ्यक्रम: केवल बौद्ध दर्शन नहीं — वेद, न्याय (तर्कशास्त्र), व्याकरण, चिकित्सा, गणित और खगोल विज्ञान भी।
- महान पुस्तकालय 'धर्मगंज': तीन भवनों में फैला — एक नौ मंज़िला बताया जाता है — जिसमें लाखों पांडुलिपियां थीं। लगभग 1200 ई. में बख्तियार खिलजी की सेनाओं द्वारा विनाश के बाद, परंपरा के अनुसार पुस्तकालय महीनों सुलगता रहा।
- अनुदान-पोषित आवासीय परिसर: 200 से अधिक गांवों का राजस्व विश्वविद्यालय के संचालन के लिए दान था — एंडोमेंट का प्राचीन मॉडल।
तक्षशिला: ज्येष्ठ भ्राता
तक्षशिला (वर्तमान पाकिस्तान में, यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल) में एशिया भर से विद्यार्थी वेद, विधि, चिकित्सा, धनुर्विद्या और राजनीति पढ़ने आते थे — व्यक्तिगत गुरुओं के अधीन, ट्यूटोरियल प्रणाली का आदि रूप। जातक कथाएं और यूनानी विवरण दोनों इसकी ख्याति के साक्षी हैं।
नालंदा के उत्खनित अवशेष 2016 में यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित हुए, और 2014 में पास ही नया नालंदा विश्वविद्यालय प्रारंभ हुआ — 1,600 वर्ष पुराना विचार, पुनर्जीवित।
सीख
प्रवेश मानकों, अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों, अनुदान-व्यवस्था, पुस्तकालयों और औपचारिक अध्ययन वाली संगठित उच्च शिक्षा — इतिहास के किसी भी निष्पक्ष पाठ में — भारत का आविष्कार है। हमारे पूर्वजों ने ज्ञान की ऐसी संस्थाएं बनाईं जैसी विश्व ने कभी नहीं देखी थीं।